“महाकौशल क्षेत्र में आदिवासी प्रतिरोध और स्वतंत्रता आंदोलन: जंगल सत्याग्रह के विशेष संदर्भ में एक अध्ययन (1885–1947 ई.)”
Keywords:
महाकौशल, आदिवासी प्रतिरोध, जंगल सत्याग्रह, वन अधिनियम, गोंड-कोरकू, सविनय अवज्ञा आंदोलन, औपनिवेशिक वन-नीति, स्वतंत्रता संग्राम।,,Abstract
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास-लेखन में प्रायः शहरी, मध्यवर्गीय और नेतृत्वपरक आंदोलनों को केंद्रीय स्थान दिया जाता रहा है, जबकि वनांचलों में रहने वाले आदिवासी समुदायों के प्रतिरोध को हाशिए पर रखा गया है। महाकौशल क्षेत्र—जिसमें वर्तमान जबलपुर, सिवनी, छिंदवाड़ा, बैतूल, नरसिंहपुर, मंडला, बालाघाट तथा होशंगाबाद जैसे जिले सम्मिलित थे—गोंड, कोरकू, बैगा, भारिया और अन्य जनजातियों का प्रमुख निवास-स्थल रहा है। इस शोध-पत्र का उद्देश्य 1885 से 1947 ई. के मध्य महाकौशल क्षेत्र में आदिवासी प्रतिरोध की प्रकृति, उसके सामाजिक-आर्थिक कारणों तथा राष्ट्रीय आंदोलन से उसके अंतर्संबंधों का विश्लेषण करना है, जिसमें विशेष रूप से 1930 के दशक में हुए 'जंगल सत्याग्रह' पर केंद्रित अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि औपनिवेशिक वन-नीति, विशेषतः भारतीय वन अधिनियम 1878 तथा 1927, ने आदिवासी समुदायों के परंपरागत जल-जंगल-ज़मीन के अधिकारों पर गहरा आघात किया, जिसके फलस्वरूप स्थानीय स्तर पर सविनय अवज्ञा के रूप में जंगल सत्याग्रह का उदय हुआ। यह आंदोलन गांधीवादी सत्याग्रह पद्धति और आदिवासी परंपरागत प्रतिरोध-चेतना के समन्वय का प्रतीक था, जिसने महाकौशल के आदिवासी समाज को राष्ट्रीय मुख्यधारा से जोड़ा।,Downloads.
Published
2026-10-15
Issue
Section
Articles
How to Cite
“महाकौशल क्षेत्र में आदिवासी प्रतिरोध और स्वतंत्रता आंदोलन: जंगल सत्याग्रह के विशेष संदर्भ में एक अध्ययन (1885–1947 ई.)”. (2026). Phoenix: International Multidisciplinary Research Journal ( Peer Reviewed High Impact Journal ), 4(3), 285-292. https://pimrj.org/index.php/pimrj/article/view/423

